March 16th, 2007 · 20 Comments

मेरा नाम जे.एल.सोनारे है, मैं मुम्बई, गोकुलधाम के साईंबाबा काम्प्लेक्स में रहता हूं, उम्र उनतीस साल, एक फिल्म प्रोडक्शन कंम्पनी में थर्ड अस्सिस्टेंट हूं, मतलब, चपरासी जैसा काम. मेरे काम्प्लेक्स में ही जबलपुर वाले रघुवीर यादव रहते हैं. आपने इनकी फिल्में जरूर देखी होंगी. दद्दा रघुबीर यादव हमें ढेर सारी कहानियां सुनाते रहते है मसलन, भेड़ाघाट के बारे में या अपनी पहली हीरोइन (आज की मशहूर लेखक) अरुन्धती राय  के बारे में, आदि आदि. मेरे वन रूम सेट के सामने सुनीता फाल्के नाम की लड़की रहती है जो किसी ट्रेवल एजेन्सी में काम करती है और अक्सर मुझे देखकर मुस्कुराते हुये मेरे सोनारे, सोनारे, सोनारेगुनगुनाने लगती है. मेरी हिम्मत कभी भी उससे बात करने की नहीं हुई. वो मेरे से ढाई गुना कमाती है, मेरा उसका क्या मुकाबला?

बताईये कैसा लगा मेरा परिचय? यदि मैं इस प्रकार आता तो आपको कोई शिकायत नहीं होती. क्या आप मेरा पुलिस वेरीफिकेशन कराते? ये सब झूठ है. मैं जे एल सोनारे नहीं हू, मुम्बई में रहता हूं. मैं ब्लाग की दुनिया में धुरविरोधी के नाम से हूं, यही मेरा परिचय है. मैं मसिजीवी भी नहीं हूं और वो भी नहीं हुं जिसके होने का कुछ लोगों को पक्का भरोसा है. (आपके सबूत भी आपको धोखा दे रहे हैं)

छद्म नाम वाले ब्लागर्स का भी एक अस्तित्व है. नोटपैड जी ने कहा है कि आप उसके ब्लाग पर जाकर उसकी लानत, मलामत वगैरह वगैरह कर सकते हैं. भले ही वह उस लानत मलामत को प्रकाशित करे, बात उस तक तो पहूंचेगी ही. अब ब्लागर का नाम जे.एल.सोनारे है या धुरविरोधी, आपका मतलब तो हल ही हो जायेगा.कुछ लोग अपने असली नाम से लिखने में सहजता महसूस करते हैं, कुछ लोग काल्पनिक नामों से. यह अपना अपना चुनाव है. सिर्फ ब्लागिंग की दुनियां में बल्कि दुनियां के हर कोने में, लेखन सहित सृजन की हर विधा में एसा होता रहता है. जो जिस तरह से सहज रहे, उसका चुनाव.

आप किसी आचार संहिता बनाने के बारे में बात कर कर रहे हैं, यदि कोई उसे तोडे़गा तो आप क्या करेंगे? उसके ब्लाग हटा देंगे, बस यही ना, यदि वह किसी दूसरे नाम से फिर आगया तो आप क्या करेंगे? अगली बार वह पुख्ता मजबूत नाम, मय सबूतों के साथ आयेगा. आप को भनक भी नहीं लगेगी. उसका गढ़ा हुआ वर्चुअल वातावरण आपके असली वातावरण को मात कर देगा. जो पहले ही छद्म नाम से आता रहा है, उसे अपने असली नाम से कोई मोह नहीं होता. अगर धुरविरोधी कभी जे.एल.सोनारे या किसी और नाम से आजाये तो क्या आप उसे पहचान सकेंगे?

हमारे बीच में कुछ सहमतियां हो सकती हैं, कुछ असहमतियां भी हो सकती हैं. आप हमेशा तो किसी के साथ सहमत होकर नहीं जी सकते ? सहमति और असहमति के बीच रहना ही तो जीवन है. यदि आप आज मुझे इस ब्लाग की वर्चुअल दुनियां से निकाल देंगे तो क्या होगा?

खुश्बू हूं मैं फूल नहीं हूं, जो मुरझाऊंगा.एक हवा के झोंके के संग फिर जाऊंगा.(जिन्हें मैं ना पसंद हूं वो सहजता के लिये खुश्बू की जगह बदबू भी पढ़ सकते हैं)

आपकाधुरविरोधीपुनश्च : यदि साईंबाबा काम्प्लेक्स में वाकई किन्ही जे.एल.सोनारे या सुनीता फ़ाल्के का अस्तित्व हो तो उनसे क्षमा याचना सहित.

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20 responses so far ↓

  •   प्रमोद सिंह
      // Mar 16th 2007 at 9:09 am

    यह तो अच्‍छा रहा।…

    दरअसल जेएल सोनारे और कोई नहीं मैं ही हूं। सुनीता फाल्‍के मेरी पत्‍नी की बचपन की सहेली है। आप मसिजीवी जी कभी बंबई आयें तो हमारे साईबाबा कॉम्‍पलेक्‍स के हमारे घर ज़रुर पधारें।

    आपही का,

    जेएल सोनारे

  •  

      shilpasharma
      // Mar 16th 2007 at 9:40 am

    हे भगवान, धुरविरोधी, क्या ट्रेलर बताया और क्या दिखाया

  •   masijeevi
      // Mar 16th 2007 at 9:47 am

    हा हा हा

    जो कहने में मैंने तीन पोस्‍ट जाया कीं आपने एक में कह डाली। यकीन मानिए आप सोनारे भी हों तो भी हमें तो साबका धुरविरोधी से पड़ा है और हमारा सिर्फ उसी से काम है। यही नहीं वे जो कहते हैं कि वे वही हैं जो वे कहते हैं हमें उससे भी कोई दिक्‍क्‍त नहीं है।

    रही प्रमोद की बात…..

    तो चूंकि आपको हमारी बदबू पसंद नहीं आई इसलिए हमने आपका ब्‍लॉग अपने फीडरीडर से हटा दिया ताकि आपको तकलीफ न हो। लेकिन मौका मिला है तो यहीं साफ कर दिया जाए कि वह अविनाश होने का मामला छद्म नाम वाला नहीं था, आपके टेक्‍स्‍ट से उपजा साइकोएनेलिटिकल पाठ भर था। मतलब आपके अंदर का अविनाश…..ज्‍यादा क्‍या कहें पहले ही इतना पढ़े हुए हैं आप….समय मिले तो फ्रायड पर भी एक नजर डाल लीजिए…वह ही कहा था।….वो क्‍या है हम तो ‘ज्ञानी’ (व्‍यंग्‍य ही है खुद पर, स्‍पष्‍ट करने से कितना बुरा लगता है) मास्‍टर ही हैं न।

  •   संजय बेंगाणी
      // Mar 16th 2007 at 10:12 am

    विरोधी भाई, सब सही है. आप जैसे चाहे लिखें. यहाँ पहले भी कई लोग छ्द्मनाम से लिखते रहे हैं, जैसे ई-स्वामी नामक प्रेत.
      )

    वैसे आपने यह पोस्ट जिस “आप” के लिए लिखी है, वह है कौन?

  •   संजय बेंगाणी
      // Mar 16th 2007 at 10:39 am

    आपने प्रेत को मोडरेट कर सजगता का परिचय दिया है, मगर यहाँ प्रेत शब्द दूर्भावनावश नहीं लिखा गया है, हम सब ई-स्वामी को प्रेम से प्रेत कहते है.
      )

  •  

      gyandutt
      // Mar 16th 2007 at 10:48 am

    लेबल चाहे जो लगा लें. हैं सब ज ल सोनारे ही.

  •  

      dhurvirodhi
      // Mar 16th 2007 at 10:50 am

    प्रमोदसिंह जी, आप मसिजीवी जी को बुला रहे हैं, मुझे क्यों नहीं?

    शिल्पाजी, ट्रेलर इसलिये अच्छा होता है कि ज्यादा से ज्यादा दर्शक आ जायें. देखिये मैं कामयाब हूं कि आप आयीं.

    मसिजीवी जी, धन्यवाद.

    संजयजी, मुझे भी आप वाला रोग लग गया है, साथ साथ आप सब की चर्चा से लगता है कि कहीं मुझे तो नहीं फ़ुटा देंगे? (आज ही डाक्टर के पास जाता हूं) मुझे नहीं मालूम था कि आप ई-स्वामी को प्यार से प्रेत कहते हैं. मेरे लिये तो वे आदरणीय हैं. सबूत के लिये मेरे ब्लाग पर मेरी पसंद का इजहार पढि़ये.

  •   जे.एल.सोनारे
      // Mar 16th 2007 at 11:57 am

    आपने मेरे नाम का उपयोग कर मुझे गहरी ठेस पहुंचायी है। मै अपने कानूनी सलाहकारो की मदद ले रहा हूं।

    सोच रहा हूं कि आप पर मानहानी का दावा कर दूं।

  •  

      raviratlami
      // Mar 16th 2007 at 1:26 pm

    “…यदि आप आज मुझे इस ब्लाग की वर्चुअल दुनियां से निकाल देंगे …”

    ब्लॉग की दुनिया में एक बार पदार्पण हो जाने के बाद ईश्वर भी किसी को नहीं निकाल सकता. वह अजर अमर अमिट हो जाता है – बशर्ते वह खुद ही खुद को न मिटा ले.

    इसीलिए, अनाम रहें या कुनाम – निश्चिंत रहें और इसी बहाने सभी चिट्ठाकारों से आग्रह है कि इस तरह की झगड़ा फजीती से हट कर कुछ सार्थक और हिन्दी की समृद्धि की खातिर ही सही, घोर नियमित लेखन करें.

    ॐ शांति शांतिः

  •   अनूप शुक्ला
      // Mar 16th 2007 at 1:34 pm

    ठीक है आप जैसे सहज हैं वैसे लिखें। जैसे आपका मन गवारा करे।

  •   Satish Oberoi
      // Mar 16th 2007 at 3:31 pm

    I liked your new entry very much. In your last entry you roused our sentiments, and in this one you raised the roof. Let me put in my two bits about this whole concept of ‘anonymous blogging’… Those who want to bring the real world inside the blogosphere are living an illusion. By trying to limit unknown bloggers they are writing their own epitaphs. Don’t you worry about this Mr. Durvirodhi, we like your writing.

    Cheers! and keep writing please.

  •   rajat
      // Mar 16th 2007 at 4:44 pm

    धुर विरोधी भइय्या,

    तुम जो भी हो, कम से कम इंसान तो हो… वरना अभी 3-4 महीने पहले तो सुना था कि आस्ट्रेलिया में कहीं इंटरनेट पर भूत था … सच में.

  •   rajat
      // Mar 16th 2007 at 4:44 pm

    इंसान ही हो ना?????????????

  •   अभिषेक
      // Mar 16th 2007 at 6:57 pm

    धुरविरोधी जी,

    अभी लेटेस्ट कॉन्ट्रोवर्सी जो शुरु हुई है छद्मनामों को लेकर, उनसे सम्बद्ध ज़्यादा पोस्ट्स पढ़ नही पाया हूँ लेकिन बस यही कहना चाहता हूँ कि आप लिखते रहिये । हमे आपका लिखा अच्छा लगता है और ये वाली पोस्ट तो और भी बढ़िया लिखी है आपने । यदि किसी के पास आपके इन सवालों का जवाब हो तो दें -

    “…यदि कोई उसे तोडे़गा तो आप क्या करेंगे? उसके ब्लाग हटा देंगे, बस यही ना, यदि वह किसी दूसरे नाम से फिर आगया तो आप क्या करेंगे? …”

    अरे भाई ब्लॉग है, ब्लॉग की तरह लो ; हल्के मे । जिसे पढ़ना हो, वो पढ़े, जिसे ना पढ़ना हो, ना पढ़े । बस…. । रोज रोज एक नया तीम झाम खड़ा करने क्या फ़ायदा ?

    धन्यवाद

  •  

      kakesh
      // Mar 17th 2007 at 1:29 am

    वाह,वाह धुरविरोधी जी ..क्या बात कही है. .बिल्कुल मेरे मन की बात..इंटरनेट पर आचार संहिता की बात करना बेमानी है…

  •   Shrish
      // Mar 17th 2007 at 6:25 am

    खूब धुरविरोधी जी, आपने तो मेरी कलई खोल दी। ऊपर प्रमोद जी झूठ बोल रहे हैं, दरअसल में ही जे.एल.सोनारे हूँ और श्रीश के नकली नाम से लिखता हूँ, लेकिन मेरी पोल खोल कर आपने अच्छा नहीं किया।
      )

  •   सृजन शिल्पी
      // Mar 17th 2007 at 7:56 am

    भले ही मुझे सच बोलने के लिए कभी मुखौटे की जरूरत महसूस नहीं हुई और अनाम रूप से कहीं टिप्पणी करने की नौबत भी नहीं आई है। जैसा कि आप कहते हैं कि मुखौटे की आड़ में सच बोलना आपको सुविधाजनक लगता है, जब तक आप सच बोलते हैं, तब तक किसी को आपके इस खेल से भला क्या आपत्ति हो सकती है। अब तक आपने धुरविरोधी के मुखौटे के पीछे छिपकर जिस अंदाज में सच बयान किया है, उस तरह के सच को पढ़ने के लिए तो तो मैं बारंबार आपके चिट्ठे पर आना चाहूंगा। आपके साथ इस खेल में जो राजदार साथी शामिल हैं, उनके अलावा भी कुछ लोग हैं, जो आपको पहचानते हैं और मुखौटे के पीछे के सच्चे इंसान से प्यार करते हैं। लेकिन कमीनेपन से मुझे नफरत है और उसके प्रति मैं निर्मम हूं। लेकिन यदि कोई अपने ब्लॉग पर कमीनापन भी दिखाए तो मैं उसका मैं क्या बिगाड़ सकता हूं, सिवाय इसके कि उसके ब्लॉग पर आना बंद कर दूं।

    एक हिन्दी फिल्म आई थी, अग्निवर्षा–जिसमें एक पौराणिक कथानक का फिल्मांकन किया गया था। उस कथानक में नाटक के पात्रों द्वारा लगाए गए मुखौटों में अचानक जान आ गई थी और फिर मुखौटे नाटक के पात्रों की भूमिका रहे व्यक्तियों पर हावी हो गए और उनसे वही सब करवाने भी लगे और फिर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और रंगमंच को श्मशान में तब्दील होते देर नहीं लगी। मुखौटे का खेल में दिलचस्पी लेने वाले चिट्ठाकारों को ध्यान रहे कि कहीं उनके मुखौटे उनपर हावी न हो जाए और उनको सर्वनाश की तरफ न ले जाएँ।

  •  

      dhurvirodhi
      // Mar 17th 2007 at 8:25 am

    धन्यवाद फ़ुरसतिया जी एवं रवि जी, आप मुझे कभी कुनाम होते देखें तो जरूर टोकिये.

    ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, kakesh जी अभिषेक जी एवं रजत जी हौसला अफ़जाई का शुक्रिया. श्रीषजी, यदि आप वाकई सोनारे हैं तो मैं अब सिर्फ माफ़ी ही मांग सकता हूं.

    सृजनशिल्पी जी;

    आपने जो विश्वास मेरे ऊपर दिखाया इसका आभार. आपके शब्द “आपके साथ इस खेल में जो राजदार साथी शामिल हैं”.

    मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं नितांत एकाकी हूं. मेरा न कोई खेल है न कोई मेरे साथ शामिल है. आप मुझे कभी भी किसी भी खेल में शामिल या मोहरा बनता हुआ न देख पायेंगे..

    आपके द्वारा अग्निवर्षा का चित्रण भयावह है. शायद मुझे कुछ दिन आराम करना चाहिये.

  •   notepad
      // Mar 17th 2007 at 12:56 pm

    सही जा रहे हो ध्रुव विरोधी जी. बिना तिल्मिलाए तस्वीर साफ़ कर दी. इस सारे ताम झाम का मकसद इतना भार था कि -विरोध दर्ज होना चाहिये. वह सबसे महत्वपूर्न है.

    “जो तट्स्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध”…….

     इसलिए इस प्रकरण मे तट्स्थ रहने वाले ब्लागर मीट के साथी व अन्य ब्लागर जो इस मुद्दे पर मुह सिए है वे भी अपनी राय ज़ाहिर करते तो अच्छा था.

  •   अविनाश
      // Mar 17th 2007 at 2:52 pm

    वाह, मज़ा आ गया।

One Response to “कौन है ये धुरविरोधी ?”

  1. masijeevi Says:

    परीक्षण- इग्‍नोर करें


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